श्री रघुवर चरण सरोज, धरि मस्तक पर धर।
चालीसा राम भजन को, भवसागर से तर॥
जय रघुनंदन जय सियाराम। जानकीवल्लभ श्री गुणधाम॥
नमो राम रघुनन्दन राजा। तुम्हीं रक्षक तुम्हीं हो साजा॥
जनम भूमि अवध पुरी नगरी। कौसल्यासुत राम तुम अगरी॥
दशरथ नंदन रघुकुल भूषण। कर्म और ज्ञान के परिपोषण॥
गुरु विश्वामित्र कीन्ह शिक्षा। ताड़का वध कर पाई दीक्षा॥
मारीच सुबाहु मारे भारी। जनक नगर में सिया विहारी॥
धनुष जनक का तोड़ा भाई। सियावर राम गए जनवाई॥
परशुराम क्रोध दूर भगाया। पितु आज्ञा वन को तुम आया॥
चौदह वर्ष वन में बिताये। भक्त भरत का दुख हटाए॥
लक्ष्मण जानकी साथ तुम्हारे। विचर वन वन दुखियारे बिचारे॥
शूर्पणखा नाक कटवाई। खर दूषण की सेना धाई॥
मारिच मायावी मारा गया। रावण सिया ले लंका सिया॥
हनुमान मिले सुग्रीव से। बालि वध कर पाए सीव से॥
सेतु बाँध के लंका पहुँचे। राक्षस सेना को जड़ से मूँचे॥
रावण मारा राज दिलाया। विभीषण को सिंहासन पाया॥
अयोध्या में रामराज हुआ। भूमि स्वर्ग सा सुखी हुआ॥
राम नाम जो नित गाता है। भव से तर संसार में जाता है॥
श्री राम का गुण जो गावे। विपत्ति दुख नहिं आन सतावे॥
चालीसा राम पढें जो नित। वाके घर में सुख रहे नित॥
राम नाम सुमिरन करें। जीवन वृक्ष हरा भरा करें॥
राम जय रघुनन्दन जय जय। जानकीवल्लभ भव भय हय॥
सियाराम सियाराम सिया राम। जपो नित्य यही सबका काम॥
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